चार भाईयो के संघर्ष की कहानी↹ हिंदी रोचक कहानी [हिंदी कहानियां] { }:Hindi Story :
- शिवराज का सफ़र
किसी राज्य में एक राजा विश्वनाथ एक रानी कन्याकुमारी रहा करते थे | राजा के चार बेटे थे सभी युद्ध कला में माहिर थे| क्रमशः नाम धनराज, शिवराज, राजवीर, और [ विष्णु कुमार था 1 दिन राजा ने अपने बेटों की परीक्षा लेने क्या प्रयास किया और सभी को उसने अलग-अलग दिशाओं में भेजा और उन्होंने जरूरत का सामान अपने साथ चल रहे घोड़ों की भीड़ लाद दिया और जंगल की तरफ रवाना हो गए इन चारों भाइयों में सबसे छोटा भाई शिवराज सबसे ज्यादा होशियार था |और उसने उत्तर दिशा में जाने का निर्णय किया कुछ समय चलते रहने के पश्चात तथा गई जंगलों को पार करने के बाद उसको एक जंगल के बीच में महल सा दिखाई देता है
![]() |
| Hindi Rochak Kahaniyan [ Jaadui Kahaniyan] |
काफी सफर करने के बाद यह बहुत थक गया किसने सोचा कि चलो इस महल में उस समय रुकने के पश्चात फिर से यात्रा शुरू की जाएगी | और इसी उद्देश्य वह इस महल के अंदर गया तब उसने अजब नजारा देखा कि अंदर कई लड़कियां अजीब अजीब कपड़े पहने हुए अजीब अजीब बर्ताव कर रही हैं जब इसने अपना परिचय बताया कि मैं विश्वनाथ राजा का बेटा हूं तो उनमें से एक लड़की जो शायद वहां की मुखिया थी उसने लड़के का हाथ पकड़ा और अपने साथ महल के अंदर ले गए शिवराज का आवा भगत किया गया इस महल में रहते रहते शिवराज को काफी समय बीत गया अब उसने महल के मुखिया से जाने को कहा परंतु महल के मुखिया ने उसे एक-दो दिन रुकने के लिए और कहा शिवराज को इस बात का बुरा नहीं लगा और वह वह एक-दो दिन और रुक गया |
तत्पश्चात उसने जाने का निर्णय कर लिया उसने मुखिया से कहा मैं यहां से जाना चाहता हूं कृपया मुझे आज्ञा दें | परंतु शिवराज को यह नहीं पता ना था कि यहां पर आते तो सब अपनी मर्जी से हैं परंतु जाने किसी को नहीं दिया जाता {असल में दोस्तों वह एक पिशाचिनी का महल था} जो कि उस जंगल में बहुत ही प्रसिद्ध था यह बात शिवराज को नहीं मालूम थी और शिवराज उनके चंगुल में फस गया इस बात को मुखिया की छोटी बेटी शिवराज को बताया तब शिवराज को समझ में आया कि वह बहुत बड़ी मुसीबत में है| पिशाचिनीयों का त्यौहार कुछ समय पश्चात आने वाला था | जिसमें शिवराज की बलि भी दी जानी थी अब शिवराज बहुत ही परेशानी में अपने भाइयों को याद करने लगा इन कुछ दिनों में शिवराज को मुखिया की छोटी बेटी से प्यार हो गया था और मुखिया की छोटी बेटी भी उससे चाहने लगी थी जब शिवराज ने अपने परेशानी को उसके सामने बताया |
हालाँकि की मुखिया की छोटी बेटी यह सभी जानकारियां जानती थी | पहले से यह सब जानने के बावजूद भी वह उससे प्यार करती थी शिवराज की बहुत मिन्नतें करने के बाद उसने एक तरकीब बताई मुखिया की छोटी बेटे ने कहा आप यहां से पूर्णमासी के दिन ही निकल सकते हो उस समय हमारी शक्तियां कम हो जाती हैं उसी समय आप यहां से निकल सकते हो शिवराज ने कहा ठीक है मैं उसी समय निकलूँगा कुछ दिनों के पश्चात पूर्णमासी का समय आ गया अब शिवराज ने मुखिया की छोटी बेटी को भी साथ चलने को कहा परंतु उसकी छोटी बेटी जाने को तैयार नहीं थी क्योंकि उसे पता था कि मैं अगर यहां से गयी तो सारी पिशाचिनी तुम्हारे पीछे पड़ जाएंगे और फिर तुम इस जंगल से नहीं निकल पाओगे शिवराज के बहुत मनाने पर मुखिया की छोटी बेटी मान गई और शिवराज के साथ चलने के लिए तैयार हो गई तत्पश्चात पूर्णमासी का दिन आया और यह दोनों महल से भाग निकले जंगल में कुछ समय चलने के पश्चात इन दोनों को ऐसा महसूस हुआ कि इनका पीछा कोई कर रहा है तथा मुखिया की छोटी बेटी ने अपनी शक्तियों से उसको जानने की इच्छा की तब उसे पता चला की मेरे परिवार के सदस्य मेरा पीछा कर रहे हैं और वह मेरे साथ ही चल रहे हैं |
तब उसे एहसास हुआ कि इस जंगल से निकलना नामुमकिन सा है मुखिया की छोटी बेटी ने शिवराज को जाने के लिए कहा परंतु शिवराज जाने से मना करने लगा हालांकि मुखिया की छोटी बेटी के बहुत मनाने पर शिवराज वहां से जाने के लिए तैयार हो गया तभी मुखिया की छोटी बेटी ने अपने परिवार वालों को चकमा देने की तैयारी कर ली इधर शिवराज जंगल पार निकल गया और उधर मुखिया की छोटी बेटी ने अपने परिवार वालों को चकमा दे दिया शिवराज का वहां से निकलना नामुमकिन था परंतु मुखिया की बेटी की मदद से वह जंगल से बाहर निकल आया जब शिवराज मौत के मुंह से बाहर निकला तो उसने अपने महल जाने को सोचा और वह महल की ओर रवाना हो गया|
- धनराज का सफ़र
राजा का दूसरा बेटा धनराज जो कि पश्चिम दिशा की तरफ जा रहा था| उसके भी रास्ते में कई जंगल पड़े जिसे पार करने के पश्चात वह एक झोपड़ी के पास पहुंचा धनराज बहुत ही थका महसूस कर रहा था वह कुछ देर झोपड़ी के पास बैठा धनराज ने क्या देखा की एक बूढ़ी मां उसके पास आई और वह कुछ खाने में और पीने के लिए लेकर आई धनराज ने जब खाना देखा तो वह खाने लगा क्योंकि धनराज काफी समय से भूखा था तो बूढ़ी मां ने कहा बेटा आराम से खाना खाओ और पानी पियो और कुछ देर यहीं ठहर जाओ धनराज बहुत खुश हुआ मैं खाना पीना खा कर कुछ देर उसे झोपड़ी में आराम किया जब धनराज की नींद खुली तो उसने देखा कि बूढ़ी मां के घर में तो एक भी बर्तन नहीं है ना कोई खाने पीने का सामान है तो फिर इसने खाना कहां से लाई धनराज यह सोचकर बहुत ही परेशान था तभी उसने बूढ़ी मां से कुछ खाने के लिए कहा उसने कहा बूढ़ी मां मुझे भूख लगी है
मुझे कुछ खाना चाहिए बूढ़ी मां ने कहा ठीक है बेटा | मैं अभी लाकर देती हूं और बूढ़ी मां झोपड़ी के अंदर गई और अंदर से खाना लेकर वापस आए धनराज यह देखकर परेशान था आखिर बूढ़ी मां खाना पानी लाती कहां से है क्योंकि घर के अंदर तो कोई भी ऐसा साधन नहीं था जिससे खाना बनाया जा सके या खाना रखा हो और धनराज जब भी बोलता तो उसके सामने खाना आ जाता धनराज ने इसका रहस्य जानने का प्रयास शुरू कर दिया धनराज वहां कुछ दिन तक रुका धनराज ने 1 दिन बूढ़ी मां से खाना मागा | मांगने के पश्चात वह बूढ़ी मां के पीछे पीछे चला गया धनराज ने देखा की एक बर्तन है जब जब बूढ़ी मां उससे कुछ मांगती उस बर्तन में वह खाना अपने आप ही आ जाता | धनराज को यह देखकर बहुत ही आश्चर्य हुआ और उसने इस बर्तन को गोर से देखा परन्तु धनराज को कुछ समछ में ना आया| धनराज कुछ समय तक वही ढहरा और एक दिन एक शेर ने बूढ़ी मां पर हमला कर दिया यह देखकर धनराज ने अपने तीर कमान से उस शेर को वहीं पर मार गिराया इस पर खुश होकर बूढ़ी मां ने धनराज से कहा मांगो बेटा क्या मांगना चाहते हो बूढ़ी मां ने कहा हालांकि मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है मगर मैं तुम्हें ऐसी चीज दूंगी जिससे तुम जिंदगी भर खुश रहोगे धनराज ने कहा हां बूढ़ी मां मुझे आपसे एक चीज चाहिए मुझे आपका वह जादुई बर्तन चाहिए| बूंदी मां अपने वचनों से बंधी हुई थी और उसने में बर्तन धनराज को दे दिया धनराज ने अपना सफर यहीं खत्म करते हुए महल की ओर वापस लौट गया |
- राजवीर का सफ़र
- विष्णू कुमार का सफ़र
महाराज का चौथा बेटा विष्णु बहुत ही धार्मिक व्यक्ति था | इसने अपना सफर पूर्व की ओर शुरू किया था | विष्णु कई जंगलों को पार करने के पश्चात अचानक विष्णु देखता है उसके सामने एक भव्य मंदिर है जिसमें एक पुजारी पूजा कर रहे हैं विष्णु उनके पास जाता है और पुजारी जी से धार्मिकता का ज्ञान लेने लगता है धार्मिकता का ज्ञान लेते लेते विष्णु को कई साल बीत जाते हैं अब विष्णु कुशल मंत्र उच्चारण, कई प्रकार से धार्मिक विद्या में निपुण हो जाता है इसके पश्चात वह अपने पिता का आवाहन करते हुए महल की ओर वापस लौटने लगता है |
- राजा विश्वनाथ का निष्कर्ष
अब राजा के चारों बेटे महल में आएं उन सभी का महल में स्वागत किया गया महल में कुछ समय ठहरने के पश्चात राजा ने अपने चारों बेटों को बुलाया और उनसे सफर में प्राप्त की गई शिक्षाओं के विषय में पूछा , राजा ने पूछा की तुम ने इस सफ़र से क्या सीखा और तुम ऐसा क्या कर सकते हो जो तुम्हारा दूसरा भाई नहीं कर सकता है? राजा का ऐसा प्रश्न पूछने का मकसद है की इन चारों में से अपनी राजगद्दी के लिए उसी को चुना जाए जो योग्य हो |
शिवराज ने बताया की पिताजी मैं जब जंगल से निकला तब मैंने कई जंगलों को पार किया अचानक एक महल को देखा तो वहां विश्राम के लिए रुका मुझे पता चला की वह पिशाच्नियो का महल है अतः मैं वहां से अपनी जान किस प्रकार बचाई जाए इसका गुण सीख कर आया हूं हालांकि वहां से निकलना नामुमकिन था परंतु मैं आज आपके सामने हूं |राजा ने कहा ठीक है,
राजा विश्वनाथ ने धनराज से पूछा धनराज ने कहा पिताजी मैंने पश्चिम दिशा की ओर सफर किया और कई जंगलों और मुसीबतों को पार करने के पश्चात मैं काफी थका हारा था कुछ दूर पर मैंने एक बूढ़ी मां की झोपड़ी देखें और कुछ समय के लिए वही रुक गया मैंने देखा कि बूढ़ी मां किसी प्रकार हर बार गर्म खाना मेरे सामने ला रही है तो मैंने जानने का प्रयास किया तो मुझे पता चला कि उसके पास कोई जादुई बर्तन है जिससे वह खाना लाती है| एक दिन बूढ़ी मां पर एक मुसीबत आई मैंने उस मुसीबत का बहादुरी से सामना किया और बूढ़ी मां ने खुश होकर वह बर्तन मुझे दे दिया वह बर्तन यह है पिताजी राजा विश्वनाथ बोले ठीक है,
बेटा राजवीर, राजवीर बोला पिताजी मैंने अपने सफ़र में कई परेशानियों का सामना किया जब मैं यहां से निकला था तब मेरे पास बुद्धि नहीं थी और मैं चलता चला गया मैं एक व्यापारी के यहां पहुंचा जिसने मुझे व्यापारी क्या होता है व्यापार किस प्रकार होता है किस प्रकार हर व्यापारी को मुनाफा होता है, पैसे से पैसा कैसे बनाया जाए इसी प्रकार का गुण मैं सीख कर आया हूं पिताजी | राजा विश्वनाथ बोले ठीक है,
विष्णु बोला पिताजी मैंने अपने सफर को भगवान के नाम से शुरू किया था और भगवान के नाम से ही खत्म किया मैं जंगलों को पार करने के पश्चात एक मंदिर पहुंचा वहां मैंने देखा की एक पुजारी भगवान की आराधना कर रहा है और मैं भी उसके साथ भगवान की आराधना करने लगा मैंने कई सालों तक भगवान की घोर तपस्या की और एक कुशल धार्मिक व्यक्ति बन कर वापस आया हूं राजा विश्वनाथ ने कहा ठीक है,
अब राजा विश्वनाथ ने अपने उच्चतम दरबारियों को बुलाया और उनसे सलाह की आखिर इस राजगद्दी का असली उत्तरदायित्व कौन है किसी ने किसी का नाम लिया किसी ने किसी का नाम लिया राजा के काफी समय तक विचार करने पर राजा ने धनराज को अपना उत्तरदायित्व बनाने का फैसला किया क्योंकि धनराज ही एक ऐसा व्यक्ति था जिसमें साहस, दूसरों पर दया, निष्ठावान कर्तव्य निभाने सारे गुण उसने अपने सफ़र से सीख कर यह साबित किया कि वह ही इस सिंहासन का असली उत्तरदायित्व है अतः राजा ने धनराज को उत्तराधिकारी नियुक्त किया |
निष्कर्ष- इस कहानी से क्या सीख मिलती है? क्या लगता है आपको क्या राजा ने सही किया या राजा को और भी विचार करना था क्योंकि सभी चारों बेटे अपनी अपनी विद्या में निपुण थे इस कहानी के जरिए मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूं यदि आपको लगता है राजा ने सही किया तो आप अपना जवाब कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं धनराज के हाथ में जो जादुई बर्तन था उस बर्तन का क्या हुआ क्या आप उस बर्तन के विषय में जानना चाहेंगे तो आप अपना जवाब जरूर लिखें यदि आप शिवराज राजवीर |और विष्णु के विषय में और जानना चाहते हैं तो आप मुझे बताएं मैं इसके आगे कहानी अवश्य बताऊंगा धन्यवाद |


0 comments